इरादा
जिसे बार-बार शुरू करता हूँ, उसे खत्म करता हूँ
@fiverivers Narrated by Lana Young 2:16 29 shots
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जहाँ हर बार रुकना हो जाता है, वह हिस्सा पीछे छूट चुका है। आज रात इस किताब में उससे आगे तक जाना हुआ जितनी दूर कभी नहीं जाया गया, और इसमें ज़रा भी नाटकीयता नहीं थी। कोई चमत्कार नहीं हुआ। एक कुर्सी थी और पंद्रह पन्ने। निशानी जहाँ है वहीं छोड़नी है और कल ठीक यही दोहराना है, और आज तक जो अकेला तरीक़ा किसी भी चीज़ पर सचमुच चला है, वह यही है। पंद्रह पन्ने कोई प्रभावशाली बात नहीं। पंद्रह पन्ने जिन्हें दोबारा कभी नहीं पढ़ना पड़ेगा, वह बिल्कुल अलग चीज़ है।
निशानी आगे खिसक गई है। उसके पीछे अब पढ़े हुए पन्नों की एक छोटी सी ढेरी है, और बिना पढ़ा हिस्सा हफ़्ता भर पहले के मुक़ाबले कहीं कम दीवार जैसा दिखता है। जिल्द सही जगह से खुलने लगी है। यह अब उस किताब जैसी दिखने लगी है जो किसी की अपनी है, न कि उस किताब जैसी जो किसी ने ख़रीद रखी है।
यह किताब चार बार शुरू की जा चुकी है। हर नई शुरुआत ने वह ज़मीन छीन ली जो पहले तय हो चुकी थी, और इसे गहराई से पढ़ना कहा जाता रहा, जो अपने ऊपर बड़ी मेहरबानी थी। असल में वह अधूरी जगह पर खड़े रहने से इनकार था। इच्छा यह थी कि गिनती उन लोगों में हो जिन्होंने इसे ढंग से पढ़ लिया, न कि उनमें जो इसे पढ़ने के बीच में हैं। इस पसंद की क़ीमत अब तक चार किताबों जितने पन्ने है और हाथ में उनमें से एक भी नहीं। यहाँ पूर्णतावाद बेहतर काम पैदा नहीं करता। वह बहुत धीरे-धीरे कोई काम नहीं पैदा करता, और महसूस कड़ाई जैसा होता है।
प्रगति को रफ़्तार की नहीं, एक निशानी की ज़रूरत होती है। पंद्रह पन्ने जो बने रहते हैं, वे उन पचास पन्नों से ज़्यादा क़ीमती हैं जिन्हें अगले वसंत में दोबारा पढ़ना पड़ेगा, क्योंकि चक्रवृद्धि से जो कुछ बढ़ता है वह सारा का सारा बने रहने में ही रहता है। शुरू से लौटना कड़ाई जैसा महसूस होता था और काम सब मिटाकर शून्य पर लौटने जैसा करता था। जो चीज़ मेरी जगह को शून्य पर लौटा दे वह रणनीति नहीं है, वह बहुत सलीक़े से छिपाया गया एक तरीक़ा है जिससे इंसान खड़ा रहता है और भीतर बेहद व्यस्त महसूस करता है। किसी चीज़ में सचमुच आधे रास्ते पर होना, बार-बार उसकी शुरुआत पर होने से कहीं बेहतर है।
तो आज रात पंद्रह पन्ने, और निशानी ठीक वहीं छोड़नी है जहाँ रुकना हो। कल वहीं से शुरू, शुरुआत से नहीं और उस आख़िरी अध्याय से भी नहीं जिस पर भरोसा है। पीछे का सब सँभला हुआ महसूस कराने के लिए दोबारा पढ़ना नहीं, क्योंकि सब सँभला हुआ महसूस करना मक़सद नहीं है और कभी था भी नहीं। सिर्फ़ आगे, वहीं से जहाँ सचमुच पहुँचा जा चुका है, वहाँ से नहीं जहाँ होना अच्छा लगता।
कल से आगे। पूरा करना हमेशा से बस इतना ही रहा है।