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इरादा

अपनी जगह पर पहली सुबह

@morningmele Narrated by Paul Rigby 2:44 35 shots

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अलार्म से पहले आँख खुल गई, और कमरा मेरा अपना है, और यह सुबह लंबे समय तक याद रहने वाली है। एक पल के लिए कुछ समझ नहीं आता कि जगह कौन सी है, फिर समझ आ जाता है, और वह समझ भीतर किसी गरमाहट की तरह उतरती है। दीवारों पर अभी कुछ नहीं। रोशनी बेहिसाब है। यह मैंने किया। क़िस्मत नहीं, वक़्त का इत्तिफ़ाक़ नहीं, किसी का यह तय कर देना नहीं कि मेरा हक़ बनता था। यह मैंने किया, और इस वाक्य को बिना झिझके कहने की आदत पड़ने में कुछ वक़्त लगेगा।

पैरों के नीचे फ़र्श ठंडा है। एक खिड़की है जिससे अभी जान-पहचान नहीं हुई, और धूप उससे ऐसे कोण पर आ रही है जो महीने भर में ज़बानी याद हो जाएगा। नीचे कहीं एक दरवाज़ा बंद होता है। केतली। पाइप में बहता पानी। इस जगह की सुबह वाली आवाज़ों का अपना समूह, जो अभी से जाना-पहचाना लगने लगा है। बिना किसी वजह के इस सिरे से उस सिरे तक चलना जारी है। इसमें कुछ भी शानदार नहीं और यह सब मेरा है।

इसमें उम्मीद से ज़्यादा वक़्त लगा। कुछ महीने ऐसे थे जब आँकड़े हिलने को तैयार ही नहीं थे, और कुछ शामें ऐसी जब हिसाब लगाना ही छोड़ देना पड़ा, क्योंकि हिसाब मेहरबान नहीं था। अब जो बात समझ में आती है और तब नहीं आती थी, वह यह है। किसी भी बड़ी चीज़ की तरफ़ बढ़ी जा रही प्रगति, जब तक चल रही होती है, लगभग पूरी तरह अदृश्य रहती है, और यह प्रक्रिया की ख़राबी नहीं, यह प्रक्रिया का ठीक वैसे ही काम करना है जैसे उसे करना चाहिए। जो महीने ख़ाली लगे थे, वे ख़ाली नहीं थे। वे वह हिस्सा थे जिसकी तस्वीर कोई नहीं खींचता, वह हिस्सा जो बाद में सुनाई जाने वाली हर कहानी में छोड़ दिया जाता है।

मेरी ग़लती यह थी कि धीमे महीने को इस बात का सबूत मान लिया गया कि काम नहीं हो रहा। भीतर से देखने पर काम होने की शक्ल धीमी ही होती है। जो भी चीज़ चक्रवृद्धि से बढ़ती है, वह लंबे अरसे तक कुछ नहीं देती और फिर एक साथ सब कुछ दे देती है, यानी आधे रास्ते पर उसका आकलन करना ही वह तरीक़ा है जिससे इंसान ठीक उसी पल हाथ खींच लेता है जब फल आने ही वाला था। मुझे और अनुशासन की ज़रूरत नहीं थी। मुझे एक बेहतर पैमाने की ज़रूरत थी, ऐसा पैमाना जो यह नापे कि भीतर क्या डाला जा रहा है, न कि यह कि अब तक बाहर क्या दिखा, क्योंकि दूसरा पैमाना महीनों तक लगातार झूठ बोलता है।

तो आज अगली मंज़िल की तरफ़ इस महीने में की जा सकने वाली एक चीज़ का नाम लेना है, और उसे कैलेंडर में वहाँ रखना है जहाँ नज़र पड़नी ही पड़े। पूरा रास्ता नहीं। वह योजना भी नहीं जो सब कुछ समेट ले और पंद्रह दिन में ढह जाए। एक चीज़, तारीख़ के साथ, क्योंकि तारीख़ वाली चीज़ एक वादा होती है और बिना तारीख़ वाली चीज़ महज़ एक मनोदशा, जो किसी व्यस्त हफ़्ते से टकराकर बच नहीं पाती। महीने इसी तरह गिनती में आने लगते हैं।

कुछ और करने से पहले एक मिनट कमरे के बीचोंबीच, बस यूँ ही खड़े-खड़े। न फ़र्नीचर, न योजना, सिर्फ़ फ़र्श, रोशनी और इस जगह की आवाज़। जिस चीज़ के लिए मेहनत की जाती है, वह जब आख़िरकार लक्ष्य होना छोड़कर एक मामूली मंगलवार की सुबह में बदल जाती है, तो वह ऐसी ही दिखती है। भीतर से देखने पर वह हमेशा ऐसी ही दिखती है, और इसीलिए बहुत कम लोग उसे पहचान पाते हैं जब वह सचमुच आ जाती है।