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इरादा

जो बात मन में लिए घूम रहा हूँ, कह देता हूँ

@slowwaves Narrated by Bret Rose 2:30 33 shots

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हमारी बातचीत फिर से शुरू है। सँभल-सँभलकर नहीं, जैसे लोग किसी बात को बचाकर निकलते हुए बात करते हैं, बल्कि ठीक वैसे ही जैसे पहले होती थी, और इस बार इसे बनाए रखना है। सीने में एक हल्कापन है जिसकी उम्मीद इस मामले में चुपचाप छूट चुकी थी। उसकी ग़ैरमौजूदगी की आदत इतनी पड़ चुकी थी कि उसका न होना दिखना ही बंद हो गया था। पता चला कि यह पूरा बोझ इतने दिनों से मेरे ही कंधे पर था।

बीच में एक मेज़ है, उस पर दो प्यालियाँ, और हममें से कोई किसी छोटी और बिलकुल बेतुकी बात पर हँस भी चुका है। वह ख़ास राहत, जब कोई जानी-पहचानी आवाज़ आपका नाम बिलकुल मामूली ढंग से लेती है, जैसे बीच का कोई वक़्त गुम हुआ ही न हो। हममें से कोई दूसरे के साथ सँभलकर पेश नहीं आ रहा। सबसे पहले यही बात ध्यान में आई, और यही याद भी रहेगी।

वक़्त बीतता गया। इरादे से कहीं ज़्यादा। हर बीता हुआ हफ़्ता पहला वाक्य लिखना और मुश्किल कर देता था, यहाँ तक कि माफ़ी माँगने की वजह ख़ुद वह ख़ामोशी बन गई, और यह बहुत साफ़-सुथरी बनावट वाला जाल है। जितनी देर तक इसे यूँ ही छोड़ा जाए, शुरुआत उतनी ही बड़ी करनी पड़ती है, और शुरुआत जितनी बड़ी करनी पड़े, उतनी ही देर तक यह छूटता चला जाता है। कोई बाहर से बीच में न पड़े तो यह चक्र सालों चलता रहता है। इंतज़ार करके दोस्ती की हिफ़ाज़त नहीं हो रही थी। हिफ़ाज़त अपनी हो रही थी, तक़रीबन तीस सेकंड की असहजता से, और उसका बिल दोस्ती के नाम काटा जा रहा था।

शुरुआत का सुंदर होना ज़रूरी नहीं था। ज़रूरी था कि वह सच्ची हो और छोटी हो। लोग लगभग हमेशा किसी दरवाज़े के खुलने का इंतज़ार करते रहते हैं। वे लगभग कभी यह नहीं जाँचते कि दरवाज़ा बना कैसे था। मेरे मन में एक पूरा सिद्धांत खड़ा हो चुका था कि इस रिश्ते को कितना नुक़सान पहुँचाया गया, और उसके साथ इसका पूरा ब्योरा भी कि अब उनके मन में मेरी क्या छवि होगी, और आख़िर में वह पूरा सिद्धांत मेरी अपनी ख़ामोशी के सिवा किसी चीज़ का बना नहीं निकला। इतने दिनों तक उस कमरे में कोई दूसरा था ही नहीं, और जो बातचीत कभी हुई ही नहीं, उसके दोनों पक्ष अकेले मेरे ज़िम्मे थे। दरवाज़ा कभी बंद था ही नहीं। बस कुंडी आज़माना छोड़ दिया गया था और उसी को बंद होना मान लिया गया।

तो आज संदेश भेजना है। दो वाक्य। तुम्हारी याद आती रही, और बात करने का मन है। पहले ही संदेश में सब कुछ सुलझाना ज़रूरी नहीं। बीच के अरसे की सफ़ाई देना, उसका हिसाब देना, या देर को जायज़ ठहराने लायक़ कोई वजह लेकर पहुँचना, इनमें से कुछ भी ज़रूरी नहीं। बस दरवाज़ा खोलना है और आगे क्या होगा यह तय करने का हक़ उन्हें देना है, जो हमेशा से उनका हिस्सा था और कभी मेरा नहीं।

जवाब में जो भी आए, अब इसे अकेले ढोना बंद। वह हिस्सा पूरा हुआ, और असल में वही इकलौता हिस्सा था जो करना मेरे ज़िम्मे था। बाक़ी कभी मेरे हाथ में था ही नहीं, और उसे अपने हाथ में मान लेना ही वह तरीक़ा था जिससे हिम्मत की जगह बस व्यस्तता बनी रही।