इरादा
जिस दोस्त से नाता टूटा, उस तक पहुँचता हूँ
@quietforest Narrated by Freddie Rock 3:03 33 shots
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हम फिर बात कर रहे हैं, और झिझक ख़त्म होने में क़रीब चार सेकंड लगे। चार सेकंड। अगली बार जब कोई रिश्ता चुपचाप ठंडा पड़ने लगेगा, तब यह आँकड़ा याद रखना है, क्योंकि जिन चार सेकंडों का इतना डर था, उन्हीं से दो साल तक बचा जाता रहा। दो साल के बदले चार सेकंड, ऐसा सौदा कोई जानबूझकर नहीं करता। यह सौदा तयशुदा ढर्रे से हुआ, और ये सौदे हमेशा इसी तरह होते हैं। यह कभी टूटन नहीं थी। यह बहाव था, और बहाव को पलटना उससे कहीं आसान है जितना उसके भीतर रहते हुए किसी को लगता है।
एक आवाज़ है जो बहुत अरसे से सुनाई नहीं दी थी और वह मेरा नाम उसी आम अंदाज़ में ले रही है। कुछ भी समझाना नहीं पड़ रहा। बातचीत तीन विषयों तक पहुँच चुकी है और उनमें से एक भी वह ख़ाली अरसा नहीं था। उनकी तरफ़ पीछे कहीं किसी का कुत्ता भौंक रहा है और वे उसके लिए माफ़ी माँग रहे हैं, और पूरे हफ़्ते में मेरे साथ जो कुछ हुआ, उसमें यह सबसे आम बात है।
हमारे बीच कुछ हुआ ही नहीं था। किसी तरह यह और बुरा है, क्योंकि दिखाने के लिए कोई क़िस्सा नहीं है और भरने के लिए कोई चोट नहीं। महज़ बेध्यानी से एक अच्छी चीज़ को ठंडा पड़ने दिया गया, फिर वह ख़ामोशी ख़ुद शर्मिंदगी बन गई, और वही शर्मिंदगी और ज़्यादा ख़ामोशी की वजह बन गई। इस पर कोई वैसा हिसाब नहीं रखता जैसा मैंने मान लिया था कि रखा जा रहा होगा। उनके नाम एक ऐसा बहीखाता चढ़ा दिया गया जो वे कभी रख ही नहीं रहे थे, और फिर अपनी ही गढ़ी हुई चीज़ को फ़ोन न करने की वजह बना लिया गया। यह एक बंद चक्कर है जिसमें निकलने का दरवाज़ा बना ही नहीं, और वह तब तक चलता रहेगा जब तक कोई उसे बाहर से न तोड़े।
दूसरी तरफ़ वाला इंसान क़रीब-क़रीब यक़ीनन ठीक इन्हीं दो वाक्यों का इंतज़ार कर रहा था। यह वह हिस्सा है जो साफ़ दिखना चाहिए और कभी दिखता नहीं, क्योंकि ख़ामोशी का सिर्फ़ अपना सिरा नज़र आता है, और अपना सिरा अपराधबोध जैसा दिखता है जबकि उनका सिरा बेरुख़ी जैसा। वह बेरुख़ी नहीं है। वह वही चक्कर है, किसी दूसरे घर में चलता हुआ, उसी ख़याल के साथ। किसी न किसी को पहल करनी पड़ती है, और पहल करने का ख़र्च सिर्फ़ इतना है कि कुछ देर के लिए वही ज़्यादा परवाह करता हुआ दिखे। यह कभी सचमुच कोई ख़र्च नहीं रहा। वह ख़र्च जैसा सिर्फ़ संदेश भेजने से पहले वाले सिरे से लगता है।
तो दो वाक्य भेजने हैं। तुम्हारा ख़याल आता रहा है। दोबारा ठीक से बात करनी है। उस ख़ाली अरसे के लिए न कोई बहाना, न कोई माफ़ी, क्योंकि माफ़ी माँगते ही वह अरसा ख़ुद बातचीत का विषय बन जाता है, और विषय वह है ही नहीं। विषय दोस्ती है। दो साल कहाँ बीते, इसका ब्योरा नहीं देना है। वह ब्योरा आज तक किसी ने चाहा नहीं।
नाता फिर जुड़ गया। बात कभी उतनी दूर नहीं गई थी जितनी दूर ख़ामोशी ने उसे दिखाया, और वह कभी जाती भी नहीं।