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इरादा

मैं एक शांत घंटा वापस लेता हूँ

@rooftopquiet Narrated by Amy Black 2:33 30 shots

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आज एक घंटा ऐसा है जो मेरा है। बाक़ी सब कुछ निपट जाने के बाद बचे हुए चंद मिनट नहीं, पूरा एक घंटा, जानबूझकर चुना गया और फिर बचाया गया। यह घंटा किसी ने दिया नहीं। मैंने इसे लिया, और बदलना उसी लेने को था। अब ज़िंदगी के बाक़ी हर हफ़्ते में ऐसा एक घंटा लेना है, और कोई पूछे कि इसमें होता क्या है तो उसे ऐशो-आराम कहकर टालना बंद।

दरवाज़ा बंद है। फ़ोन दूसरे कमरे में पड़ा है और फ़िलहाल वह किसी और की समस्या है। पास रखी प्याली ठंडी हो रही है क्योंकि उसका ध्यान ही नहीं रहा, और यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि यहाँ भीतर कुछ असली चल रहा था। पचास मिनट से किसी से एक शब्द नहीं हुआ, और इसका ख़र्च किसी एक इंसान पर भी नहीं पड़ा।

यह घंटा सालों तक बिना ध्यान गए बँटता रहा। वह छोटे-छोटे टुकड़ों में उन लोगों के पास चला गया जिन्होंने माँगा तक नहीं था और जिन्हें उसकी कमी भी न खलती, और सबसे ज़्यादा चुभन वहीं है। इसे किसी ने छीना नहीं। एक-एक हाँ करके यह ख़ुद सौंपा गया, क्योंकि हर अलग-अलग हाँ इतनी छोटी थी कि उसके लिए मोर्चा लेना बेमानी लगता था, और उनमें से कोई भी अकेली हाँ कभी वह पल नहीं लगी जहाँ लकीर खींची जाए। ख़तरनाक वही छोटी माँगें होती हैं। एक घंटे को मना कर दिया जाता है। दस मिनट दिन में छह बार दे दिए जाते हैं। पूरी ज़िंदगी इसी तरह ख़र्च हो जाती है, बिना किसी के यह तय किए कि उसे ख़र्च करना है।

एक घंटा स्वार्थ नहीं है। बाक़ी तेईस घंटों में जो कुछ काम का होता है, उसकी जड़ यही घंटा है। जिन लोगों की परवाह है, उन सबको इस घंटे के उस पार वाला बेहतर संस्करण मिलता है, यानी इसे बचाना कोई ऐसा काम नहीं जो उनके लिए हाज़िर होने की जगह किया जाए। यही वह चीज़ है जिसकी वजह से हाज़िर होना मुमकिन रहता है। यह वक़्त उन लोगों से छीना नहीं जा रहा जो मायने रखते हैं। यह वह देखभाल है जो मुझे उनके वक़्त के लायक़ बनाती है। इस घंटे से सबसे कम नुक़सान ठीक उन्हीं का होता है जो सबसे ज़्यादा प्यारे हैं, और दस साल तक यह बात मेरे दिमाग़ में उल्टी चढ़ी रही।

तो इस हफ़्ते कैलेंडर में एक घंटा रोकना है, और उस पर एक नाम लिखना है। नाम मायने रखता है, क्योंकि बिना नाम वाला ख़ाना खिसका दिया जाता है और नाम वाले ख़ाने की इज़्ज़त होती है, मेरी अपनी नज़र में भी। फिर किसी एक इंसान को बता देना है कि वह घंटा भरा हुआ है, क्योंकि ज़बान पर आ जाने के बाद ही इरादा एक ऐसी हक़ीक़त बनता है जिसके इर्द-गिर्द बाक़ी लोगों को अपना रास्ता बनाना पड़ता है। जिस घंटे के बारे में किसी को पता न हो, वह बुधवार दोपहर तक चुपचाप किसी और काम के नाम लग जाता है।

एक घंटा, जो मेरा है। इसे कमाना नहीं पड़ा, और इसका हिसाब किसी को नहीं देना, ख़ुद को भी नहीं, और सबसे आख़िर में यक़ीन मुझे ही आया।