इरादा
मेरा शरीर मुझे पूरे दिन संभालता है
@quietforest Narrated by Chuck Goode 2:22 32 shots
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पूरा दिन निकल जाता है और उसके बाद भी कुछ बचा रहता है। सीढ़ियाँ चढ़ने से पहले भीतर कोई बहस नहीं होती। शरीर वह सब करता है जो दिन माँगता है और शाम को भी वह मौजूद रहता है, और मैं भी, और यह हमेशा सच नहीं रहा, और इसका सच न होना दिखना भी बंद हो चुका था। शाम आठ बजे वाला मेरा जो रूप है, उससे मुलाक़ात हुए बहुत अरसा हो गया था।
सीढ़ियों के ऊपर पहुँचकर सीने में हवा बची रहती है। नींद आती है और वह सचमुच की नींद होती है, वह वाली जो ठीक से पूरी होती है, वह नहीं जो बस चुक जाती है। दोपहर में, जहाँ पहले दिन का सपाट हिस्सा रुकी हुई साँस की तरह पड़ा रहता था, अब बस और दिन है। गाड़ी से सारा सामान एक ही चक्कर में भीतर आ गया और इस पर ध्यान तक नहीं गया।
कुछ अरसे तक बहुत कम पर गुज़ारा चल रहा था और उसी को सँभल जाना कहा जा रहा था। अब पता है कि उसकी क़ीमत क्या होती है। यह न कोई नैतिक चूक है और न अनुशासन की कहानी, और इसका जो भी रूप अनुशासन की कहानी बनाकर बेचा जाता है, वह कुछ न कुछ बेच रहा होता है। यह एक बिल था जो ऊर्जा में चुकाया जा रहा था और उसका पर्चा कभी सामने नहीं आया। अजीब बात यह है कि जितने दिन यह चला, उतने दिन यह बिलकुल सामान्य लगा। फ़र्श का नीचे धँसना किसी को दिखता नहीं। दिखता तब है जब वह वापस ऊपर आता है, और तब यक़ीन ही नहीं होता कि इतने नीचे रहकर गुज़ारा हो रहा था।
यह सब किसी बड़े कायाकल्प से नहीं आया। कायाकल्प ही वह तरीक़ा था जिससे पहले हर बार नाकामी मिलती थी, क्योंकि जिस भी योजना की शर्त यह हो कि सोमवार से एक बिलकुल दूसरा इंसान बन जाना है, उसमें नाकामी का एक ही बिंदु शुरू से जड़ा होता है। यह दस मिनट की उस सैर से आया जिससे कोई मोलभाव नहीं किया गया। छोटी, बार-बार दोहराई गई, बिलकुल साधारण। इतनी आसान कि प्रभावशाली लग ही नहीं सकती, और ठीक इसीलिए काम कर गई, क्योंकि प्रभावशाली चीज़ें नाज़ुक होती हैं और उबाऊ चीज़ें टिकाऊ। मुझे इसका ऐसा रूप नहीं चाहिए जो देखने में अच्छा लगे। मुझे वह चाहिए जो एक बुरे हफ़्ते से बचकर निकल आए।
तो आज दस मिनट की सैर। कुछ घटाने के लिए नहीं और कुछ ठीक करने के लिए भी नहीं, बस चलने के लिए, आज जितनी भी रफ़्तार बन पड़े उतनी। फिर कल भी उसी वक़्त वही, ताकि फ़ैसले की क़ीमत दोबारा न चुकानी पड़े। असली इलाज समय तय कर देना है। चलना तो लगभग संयोग है। जिस चीज़ के बारे में हर एक दिन नए सिरे से फ़ैसला करना पड़े, वह चीज़ एक दिन छूट ही जाती है।
बात रूप-रंग की नहीं है। बात इसकी है कि ज़िंदगी के जिन हिस्सों की सचमुच परवाह है, उनके लिए अपने भीतर इतना बचा रहे कि वहाँ पूरी तरह मौजूद रहा जा सके, और यही इकलौती वजह है जिसके लिए यह सब कभी करने लायक़ था। बात क्षमता की है। बाक़ी सब सजावट है।