इरादा
जिसने मेरे लिए कुछ किया, उसे बता देता हूँ
@fiverivers Narrated by Chuck Goode 2:06 27 shots
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मैंने उनसे कह दिया। कोई आम सा शुक्रिया नहीं, ठीक वह बात, और दूसरी तरफ़ उसका गिरना साफ़ सुनाई दिया। यह अब कहीं ज़्यादा बार करना है, क्योंकि इसमें क़रीब नौ सेकंड लगे और यह साफ़ था कि वह किसी ख़ाली कमरे में नहीं गिरी। जिस चीज़ की पूरी क़ीमत सौंप दिए जाने में हो, उसे थामे रखने की कोई वजह नहीं।
दूसरी तरफ़ एक ठहराव है जिसका मतलब है कि इसकी उम्मीद नहीं थी। फिर एक हँसी, ज़रा सी लड़खड़ाई हुई। उनके पास जवाब तैयार नहीं था, और ठीक इसी से मालूम होता है कि यह कहने लायक़ था। जो बातें लोग अक्सर सुनते हैं, उनके जवाब उनके पास तैयार रहते हैं। लाइन पर एक गर्माहट है जिसका ज़िक्र हम दोनों में से कोई ज़बान पर नहीं लाएगा।
यह बात सौ बार सोची गई और ठीक एक बार भी कही नहीं गई। मान लिया गया था कि उन्हें पता होगा। लोगों को क़रीब-क़रीब कभी पता नहीं होता, और यह बात मुझसे बेहतर किसे मालूम होनी चाहिए, क्योंकि जब वह मेरी तरफ़ मुड़ी हो तो मुझे भी पता नहीं चलता। दुनिया में क़द्र की एक बहुत बड़ी मात्रा ऐसी है जो कभी भेजी ही नहीं जाती, लोगों के सिर में पड़ी रहती है, जहाँ वह किसी के लिए कोई काम नहीं करती। पूरी उम्र उसी ढेर में इज़ाफ़ा किया जाता रहा, और साथ-साथ भीतर ही भीतर यह चाहत भी रही कि कोई अपना ढेर मेरी तरफ़ ख़ाली कर दे। इन दोनों हिस्सों को ठीक करना मेरा काम है और उनमें से सिर्फ़ एक मेरे बस में है। जो चीज़ भेजने से इनकार था, उसी के मिलने का इंतज़ार किया जा रहा था, और इस मोर्चे पर मेरे पास कोई सफ़ाई नहीं।
ठीक-ठीक उस बात का नाम लेना ही उसे असली बनाता है। हर चीज़ के लिए शुक्रिया, इसका कोई मतलब नहीं, क्योंकि यह किसी से भी, किसी भी बात पर कहा जा सकता था। उस मंगलवार के लिए शुक्रिया जब देर तक रुकना हुआ, यह किसी ख़ास जगह गिरता है और वहीं टिका रहता है, कभी-कभी सालों तक। पूरी मशीन इसी ठीक-ठीक होने में है। आम तारीफ़ एक सुहानी आवाज़ है जो छूते ही उड़ जाती है। ख़ास तारीफ़ इस बात का सबूत है कि किसी का ध्यान सचमुच वहाँ था, और किसी दूसरे इंसान को सौंपी जा सकने वाली सबसे दुर्लभ चीज़ों में ध्यान भी है।
तो संदेश भेजना है और ठीक-ठीक उस काम का नाम लेना है जो उन्होंने किया। एक ख़ास काम, सीधे-सादे शब्दों में बताया हुआ, न उसके इर्द-गिर्द कोई गोलमोल, न आख़िर में कोई मज़ाक़ जो उसका वज़न हल्का कर दे। आख़िर वाला मज़ाक़ ही वह पुर्ज़ा है जो पूरी बात को खोल देता है, और उसी मज़ाक़ का इस्तेमाल पूरी उम्र इसलिए होता रहा कि ज़बान से कुछ सचमुच कह देने का ख़तरा न उठाना पड़े।
कह दिया। इसका कोई ख़र्च नहीं आया, और लगता है कि उनका पूरा हफ़्ता बन गया।